संभाग के इकलौते बाजार में पसरा सन्नाटा



बिलासपुर।  मांग तो दूर, बोहनी तक नहीं हुई है। चालू सप्ताह का छठवां दिन भी ऐसा ही रहा। ऐसे में दूसरे कारोबार में परिवार के भरण पोषण की संभावना खोज रहा है, संभाग का इकलौता खोवा बाजार।

विघ्नहर्ता ने नहीं की खोवा बाजार पर कृपा। क्यों पीछे रहते भगवान विश्वकर्मा, तो उन्होंने भी मौन साध लिया। स्थिति इतनी विकट पहली बार सामने है खोवा बाजार के। टूटता धैर्य अब अन्य कारोबार की खोज के लिए विवश कर रहा है। जिससे भरण पोषण की चिंता दूर की जा सकती है।

इसलिए खत्म हो रहा खोवा

खोवा के बड़े खरीददार माने जाते  हैं, स्वीट कॉर्नर लेकिन इनकी खरीदी तेजी से घट रही है क्योंकि पैक्ड मिठाइयों की खरीदी को लेकर उपभोक्ता रुझान साल-दर -साल बढ़ रहा है। हद तो यह कि घरों में बनाई जाने वाली परंपरागत मिठाइयां भी कंपनियां बनाने लगीं हैं। इस तरह की कारोबारी गतिविधियों ने घरेलू मांग भी खोवा में घटा दी है।

यहां से भी मांग नहीं

बलौदा बाजार, सारंगढ़, कोरबा, मुंगेली, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले भी भरपूर मात्रा में शहर के खोवा बाजार से खरीदी किया करते थे लेकिन इन जिलों में भी पैक्ड मिठाईयां ने पहुंच बना ली है। इसलिए बड़ी मांग वाले यह उपभोक्ता जिले भी खोवा की खरीदी से किनारा कर चुके हैं। यह तब, जब पर्व के दिनों में भी 250 रुपए किलो जैसी निम्न कीमत पर स्थिर है खोवा।

सहयोग दें साहब…

खाद्य एवं औषधि प्रशासन की समय-बेसमय सघन जांच और सख्त कार्रवाइयों को लेकर भी खोवा बाजार खासा नाराज है। कहना है कि ऐसी कार्रवाईयां खोवा बाजार की नकारात्मक छवि बनातीं हैं। लिहाजा प्रशासन से आग्रह है कि आवश्यक सहयोग दें, ताकि खोवा बाजार का अस्तित्व बना रहे, जो आज संकट में है।

7 दिन से बोहनी तक नहीं

शून्य थी गणेश पर्व में खोवा की मांग। भगवान विश्वकर्मा की कृपा भी नहीं रही। चालू सप्ताह का छठवां दिन है, जब बोहनी तक नहीं हुई है। शायद यह पहला ऐसा साल होगा, जब अच्छी बिक्री की बजाय बोहनी की प्रतीक्षा कर रहा है खोवा बाजार। ऐसी स्थिति में आगत नवरात्रि से विशेष मांग की अपेक्षा नहीं है।