तिलहन में सोयाबीन और कुसुम शून्य
भाटापारा। सोयाबीन और कुसुम शून्य लेकिन अलसी गर्म होने लगा है क्योंकि वार्निश पेंट इकाइयों की मांग निकल रही है। दलहन में अरहर तो मजबूत है, पर बटरी और तिवरा में खरीदी का दबाव जिस तरह बना हुआ है, उससे नई फसल की आवक तक आशंका तेजी की ही बनती नजर आ रही है।
धान के बाद अब दलहन-तिलहन में तेजी की धारणा बनने लगी है। मौसम जिस तरह बना हुआ है उसे देखते हुए दलहन मिलों ने दलहन उत्पादक राज्यों से संपर्क न केवल बढ़ा दिया है बल्कि खरीदी की मात्रा भी बढ़ा दी है। तिलहन में सरसों की आवक घटते क्रम पर है, तो सोयाबीन और कुसुम किसानों ने भाटापारा मंडी से दूरी बना ली है।

शून्य यह दोनों
बीते एक सप्ताह से कुसुम और सोयाबीन की आवक शून्य है। मांग तो है लेकिन किसान भंडारित उपज को बेचने के लिए उत्साह नहीं दिखा रहा है। अलबत्ता दीपावली के लिए अग्रिम तैयारी में लगीं वार्निश पेंट उत्पादक इकाइयों की मांग ने अलसी की गर्मी बढ़ा दी है। 5900 में हो रहे सौदे के बाद आगे भी तेजी की धारणा है। अलबत्ता 4400 से 4500 रुपए क्विंटल पर सरसों ठहरी हुई है।

उबल रही अरहर
प्रतिकूल मानसून और नई फसल की आवक में लंबी अवधि को ध्यान में रखते हुए दलहन इकाइयां अब उत्पादक राज्यों से संपर्क बढ़ा रहीं हैं क्योंकि बीच की अवधि में घरेलू मांग के लिए आपूर्ति बनाए रखना होगा। इसलिए प्रांगण में आ रही अरहर 10800 रुपए और बाहरी खरीदी 12000 रुपए क्विंटल पर होने की खबर है। महंगी अरहर दाल का विकल्प बन चुका बटरी 5900 से 5950 रुपए क्विंटल की ऊंचाई पर पहुंचा हुआ है, तो तिवरा में आंशिक मंदी के बाद भाव 4300 से 4350 रुपए पर बोले जा रहे हैं। ऐसा ही हाल चना में भी है, जो 6000 से 6200 क्विंटल पर शांत है।

बनी रहेगी तेजी
दलहन-तिलहन की नई फसल में लंबा वक्त है। इसलिए जरूरत के मुताबिक किसान भंडारित उपज निकाल रहे हैं लेकिन मानसून की प्रतिकूलता को देखते हुए मात्रा नहीं बढ़ाई जा रही है जबकि खरीदी का स्तर बना हुआ है। ऐसे में इकाइयों की ज़रूरतें पूरी नहीं हो पा रहीं हैं। यही वजह है कि दलहन की सभी प्रजातियां अगली फसल की आवक तक तेज ही रहेंगी।
