सीजन में भी ऑफ सीजन जैसा
शहरी मांग में भारी गिरावट
भाटापारा। हर आकार की मांग, हर क्रय शक्ति को ध्यान में रखते हुए बनाया गया लेकिन औसत ही है जलकुंड याने कोटना की मांग। आएंगे अच्छे दिन जैसे वाक्य से इसलिए दूरी बना रहा है यह कारोबार क्योंकि मानसून के दिन करीब आ रहे हैं।
पत्थर का नहीं,अब बनाया जा रहा है सीमेंट का कोटना। खरीदा भी जाता है लेकिन बढ़ते पशुधन के बावजूद भीषण गर्मी में भी मांग का स्तर जस का तस है । ऐसे में नए निर्माण की गति धीमी किये जाने की योजना है l वैसे भी बारिश के दिनों में उत्पादन कमजोर रहता आया है ।

सेवा भावना गायब
पशुधन के मामले में जिला बेहद धनी माना जाता है लेकिन चारा और पानी की तलाश में भटकते मवेशी प्रमाण हैं कि सेवा की भावना तेजी से ख़त्म हो रही है । समान भागीदारी ऐसे मवेशी मालिकों की भी है जिन्होंने अपने मवेशी खुले में इसलिए छोड़ दिए हैं क्योंकि चारा की खरीदी नहीं करना चाहते । इनमे ऐसी गायों की संख्या ज्यादा है, जिन्होंने दूध देना छोड़ दिया है।

शहर कम, गाँव ज्यादा
गौ सेवा के मामले में शहर तेजी से पीछे हो रहा है। इसमें भी आबादी क्षेत्र अव्वल स्थान पर है। जबकि यही क्षेत्र गौ सेवा पर खूब अभियान चलाता है और प्रवचन देता है । दिलचस्प बात यह है कि प्रवचन पर अमल के मामले में ग्रामीण क्षेत्र की हिस्सेदारी शिखर पर है । चलाया जाना चाहिए घुमंतू मविशियों की सेवा के लिए अभियान लेकिन पहल कौन करेगा ?

निर्माण की गति धीमी
श्रम साध्य काम था पत्थर का जलकुंड याने कोटना का बनाया जाना। अब सीमेंट के जलकुंड बनाए जा रहे हैं। आकार और क्रय शक्ति को देखते हुए इकाईयां 300 से 650 रूपए तक की कीमत वाले कोटना बना रही हैं। लेकिन औसत ही है इनकी मांग। यह इसलिए भी क्योंकि प्लास्टिक के ड्रम विकल्प के रूप में सामने हैं । यही वजह है कि कोटना बनाने वाली इकाईयां निर्माण की गति धीमी करने की कोशिश में हैं ।
