बिलासपुर। मिल रहा है जोरदार प्रतिसाद लड्डू, कुकीज और चॉकलेट को। अब बनने लगा है जूस और आचार भी। इसलिए शुरुआती दौर में ही महुआ के फूलों ने 45 से 46 रुपए किलो जैसी नई कीमत अपने नाम कर ली है।

सालाना उत्पादन भले ही बीते 10 बरस से एक स्तर पर ठहरा हुआ हो लेकिन कीमत हर बरस बढ़ रही है। बढ़त का यह दौर इस साल भी बना हुआ है। यह इसलिए क्योंकि उत्पाद विविधता हर साल नए रूप में सामने आ रही है। पहली बार महुआ में निर्यात की संभावना बनती नजर आ रही है।

टपकने लगे महुआ फूल

बस्तर और गरियाबंद के वनांचलों में महुआ की नई फसल ने आमद दे दी है। सरगुजा और जशपुर के जंगलों में भी संग्रहण का काम बहुत जल्द शुरू होने के संकेत मिल रहे हैं। परिपक्व हो रहे महुआ फूल इस वर्ष उत्पादन का नया कीर्तिमान बना सकते हैं क्योंकि मौसम साफ है। यह स्थिति संग्राहकों और महुआ बाजार को रिकॉर्ड संग्रहण एवं खरीदी के लिए तैयार रहने के लिए संदेश दे रही है।

अब जूस और आचार भी

सालाना उत्पादन 5 लाख क्विंटल। स्थिर है उत्पादन की यह दर लेकिन कीमत हर साल बढ़ रही है क्योंकि लड्डू, कुकीज और चॉकलेट बनने लगे हैं महुआ से। उत्पाद विविधता के इस दौर में अब जूस और आचार भी बनाए जाने लगे हैं। उपलब्धता फिलहाल महानगरों तक ही सीमित है लेकिन मिलता प्रतिसाद छोटे शहरों के बाजार को भी खरीदी के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।

नया पुराना दोनों गर्म

महुआ में नई फसल की प्रति किलो कीमत 45 से 46 रुपए बोली जा रही है, तो बीते साल का सूखा महुआ 50 से 52 रुपए किलो पर पहुंच चुका है। थोड़ी हल्की गुणवत्ता वाला सूखा महुआ 44 से 46 रुपए किलो पर मजबूत है। तेजी की धारणा इसलिए है क्योंकि मांग के अनुरूप उपलब्धता सीमित है। इधर पहली बार यूके से निर्यात सौदे की खबर भी है।

आशंका और तेजी की

आदिवासी क्षेत्रों में महुआ से रोटी, पूरी और कई तरह की खाद्य सामग्री पहले से ही बनाई जाती रही है। अब लड्डू, कुकीज और जूस ने महुआ को शहरी उपभोक्ताओं तक पहुंचा दिया है। इसलिए कीमत में तेजी की आशंका है।

  • सुभाष अग्रवाल, एसपी इंडस्ट्रीज, रायपुर