महामाया उत्पादक किसानों का हो रहा मंडी से मोहभंग



भाटापारा। इस कीमत पर नहीं बेचना है, अपनी कृषि उपज। ऐसी व्यवस्था भी नहीं चाहिए, जो परेशान करती हो। इस विचार ने मंडी प्रांगण की रौनक गायब कर दी है। सप्ताह के पहले और दूसरे दिन की आवक देखकर मंडी प्रशासन सफाई दे रहा है कि सोसाइटियों की ओर किसानों का ध्यान ज्यादा है, इसलिए प्रांगण में आवक कम हो रही है लेकिन लगातार कम होती कीमत और चारों ओर फैली अव्यवस्था को लेकर उसने मौन साध रखा है।

सीजन के दिनों में घटती आवक को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। अव्यवस्था को दूर करने को लेकर जैसी चुप्पी साध ली गई है, वह भी कई सवाल उठा रही है। सीधी खरीदी और कम कीमत जैसी अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार किसे माना जाए? जैसे सवाल भी उठने लगे हैं। कम कीमत पर हो रही खरीदी भी देख रहा है। दूर होनी थी यह अव्यवस्था लेकिन चुप्पी के बाद घटती आवक के जरिए किसानों ने साफ संकेत देने की कोशिश की है कि नहीं चाहिए ऐसी व्यवस्था।

स्वीकार नहीं यह कीमत

घटती आवक के बाद कारोबारी सप्ताह के पहले और दूसरे दिन महामाया धान की कीमत ने जैसा गोता लगाया, उसने किसानों को हैरत और चिंता में डाल दिया है। शुरुआती बोली 1600 रुपए पर रही और अंतिम बोली 1900 रुपए क्विंटल पर लगी। टूट का यह क्रम बीते कारोबारी सप्ताह में उस वक्त देखा गया, जब वाहनों को प्रवेश में घंटों का समय लगा। इसलिए किसानों ने आवक पर एक तरह से ब्रेक लगाना चालू कर दिया है।

यह कैसे ?

मंडी सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जितनी आवक प्रांगण में हो रही है, उससे कहीं ज्यादा मात्रा मिलों में पहुंच रहा है। सड़क पर हो रही खरीदी-बिक्री की अनुमति किसने दी ? जैसे सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि सीधी खरीदी हमेशा से बंद रही है। फिर कैसे ? जैसे सवालों के बीच मंडी निरीक्षकों की कार्यशैली भी संदेह के घेरे में आ चुकी है।

आवक और कीमत

कारोबारी सप्ताह के पहले और दूसरे दिन आवक का कम होना जारी रहा। पहले दिन जहां 15 से 20 हजार कट्टा महामाया धान की आवक रही, तो दूसरे दिन भी हाल ऐसा ही बना रहा। इस बीच महामाया धान 1600 से 1900 रुपए क्विंटल, सरना 1550 से 1600 रुपए, सफरी में 1600 रुपए क्विंटल भाव बोले गए। बारीक धान में मजबूती का रुख बना हुआ है। लिहाजा एचएमटी 2400 से 2500 रुपए, सियाराम 2500 रुपए और विष्णु भोग में लिवाली 3200 से 3800 रुपए क्विंटल पर रही।