रतनपुर। शहर में चार सौ साल बाद फिर जीवंत हुई रतनपुर राज के हिस्सा रहे उड़ीसा की मंदिरों और लोक राग में रची बसी गोटी-पुआ नृत्य। बज्र गणेश उत्सव समिति का मंच था हजार साल पुरानी उसी हाथी किले के परकोटे के ठीक बाहर, जहां अब सड़क पसरी है। कलाकारों की जरुरत के हिसाब से मंच छोटा पड़ गया, पर अद्भुत प्रदर्शन की बड़ी लकीर ने दर्शकों को डेढ़ घंटे तक जमे रहने को मजबूर किया। कमसिन लड़कों के भगवान कृष्ण की लीलाओं का नव रस के भावों से भरे मंचन ने समां बांध दिया। करीब डेढ़ घंटे तक का अनवरत प्रदर्शन दर्शकों के दिलों पर उतर गया। जो सालों स्मृतियों में रहने लायक है। गोटीपुआ मंचन से पहले सबके लिए कौतूहल था। मंच से जो निकला वो किसी की भी जिज्ञासा को शांत करने के लिए पूरा था। सचमुच में सब-कुछ अद्भुत था रोमांच पैदा करने वाला।

क्या है गोटी-पुआ

गोटी-पुआ नृत्य ओडिशा राज्य का पारंपरिक लोक नृत्य है। उड़िया भाषा में “गोटी” का अर्थ होता है “अकेला” और “पुआ” का अर्थ होता है “लड़का” यानी एक अकेला लड़का। हालांकि वर्तमान में इसे लड़कों के समूह द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इसमें 14 साल से कम उम्र के लड़के जो लड़कियों के वेश-भूषा में भगवान जगन्नाथ और श्री कृष्ण की स्तुति में कठिन योग मुद्राएं और हैरतअंगेज कलाबाजियां प्रस्तुत करते हैं।

यूथ हॉस्टल एसोसिएशन ऑफ इंडिया की बिलासपुर यूनिट के शैलेश शुक्ला ने कहते हैं प्राचीन काल में ओडिशा के मंदिरों में भगवान की आराधना के लिए महिला नर्तकियां होती थीं, जिन्हें ‘महारी’ या ‘देवदासी’ कहा जाता था। 16वीं शताब्दी के आसपास समाज में महिलाओं के नृत्य करने पर पाबंदियां लगने लगी।  महारी परंपरा का पतन होने लगा। मंदिरों में नृत्य कला के अस्तित्व को बचाने कोशिश शुरू हुई। भोई राजवंश के संस्थापक राजा रामचंद्र देव के शासनकाल में गोटीपुआ नृत्य को बचाने प्रयास हुए। इसमें  बड़ी समस्या नृत्य के लिए समाज में महिलाओं का न मिलना था। इसका विकल्प कमसिन लड़कों में खोजा गया। 14 साल के कम उम्र के लड़कों की नजाकत को गुरु कुल के कठोरतम परिश्रम से गुरुकुलों प्रशिक्षित कर पारंगत किया गया। जिन्हें अब हम पारंगत रूप में देख पा रहे हैं।

स्त्री वेशभूषा और सोलह श्रृंगार

गोटी-पुआ नृत्य करने लड़कियों की तरह वेशभूषा में लड़के सोलह श्रृगार करते। पारंपरिक ‘कांचुला’ यानी ब्लाउज और ‘नीवी’ ओडिशा की विशेष साड़ी पहनते हैं। चेहरे पर महीन पेंटिंग, आंखों में काजल, बालों में जूड़ा और फूलों का गजरा सजाया जाता है।

अद्भुत बंध नृत्य और गायन

गोटीपुआ का सबसे रोमांचक प्रसंग ‘बंध नृत्य’ है। इसमें कमसिन लड़के जटिल और कठिन योग मुद्राएं कर अद्भुत कलाबाजियां करते हैं, जो दर्शकों को हैरान करती है। इसके लिए गुरुकुल में बहुत ही छोटी उम्र अमूमन चार-पांच साल से ही पारंगत गुरु के सानिध्य में योग, नृत्य, संगीत और करतब के कठोर अभ्यास करते हैं। गोटीपुआ में जयदेव कृत ‘गीत गोविंद’, संस्कृत स्तुतियां और राधा-कृष्ण पर आधारित उड़िया कविताओं का गायन नृतक करते हैं।

वैष्णव धर्म और सखीभाव दर्शन

ओडिशा में वैष्णव धर्म और गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का गहरा प्रभाव था। वैष्णव दर्शन के ‘सखीभाव’ के अनुसार, आत्मा को स्त्री यानी गोपी या सखी और परमात्मा को एकमात्र पुरुष श्री कृष्ण माना जाता है।  लड़कों को लड़कियों की वेशभूषा और श्रृंगार में भगवान कृष्ण, राधा और गोपियों के प्रेम को प्रदर्शित करने गोटी-पुआ नृत्य माध्यम बना।

नृत्य के साथ नहीं होती जवानी की दहलीज पार

ये विडम्बना है कि बाकपन से जिस कला में समर्पण और कठोर श्रम में तपकर लडके पारंगत होते हैं। उसे जवानी की दहलीज पर आते ही छोड़ने को विवश हो जाते हैं। प्रकृति उन्हें ऐसा करने पर मजबूर कर देती है। उम्र के साथ होते शारीरिक बदलाव और आवाज ऐसा करने पर उन्हें मजबूर कर ही देता है। जो अब इस नृत्य परंपरा की विशेषता हो गई है।

शहर की ओर से आभार

सामाजिक कार्यकर्ता और रियल एस्टेट डेवलपर्स की राष्ट्रीय संस्था क्रेडाई (CREDAI – Confederation of Real Estate Developers’ Associations of India) के बिलासपुर चैप्टर के अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव का रतनपुर की ओर से हार्दिक आभार जिनकी वजह से कभी रतनपुर राज के हिस्सा रहे उड़ीसा अबके पड़ोसी राज्य ओड़िसा के लोक राग में रचे बसे गोटीपुआ नृत्य का प्रदर्शन हो सका। अब के कस्बाई शहर की नई पीढ़ी को इसे देखने और परिचित होने का अवसर मिला। कार्यक्रम में नगर पालिका अध्यक्ष लवकुश कश्यप, शीतल जायसवाल, मंसूर खान, एसडी मिश्रा, पूर्व पार्षद राजू श्रीवास, महेंद्र कश्यप, रियाज खोखर, पुष्पकांत कश्यप सहित जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी भी रही।