प्रकृति प्रदत्त जल संकेतक की हुई पहचान

सतीश अग्रवाल

बिलासपुर। अब झाड़ियों और घास के नीचे जल के अकूत भंडार से बुझाई जा सकेगी प्यास। बस्तर, सरगुजा और कोरिया के वनांचल में घास और झाड़ियों की पांच ऐसी प्रजातियां मिली हैं जो सूखे दिनों में भी जल संकट से छुटकारा दिलाने में सक्षम हैं।

पहचाना जाता रहा है पीपल, अर्जुन, करंज, जामुन, बरगद और कुम्ही के साथ जंगली खजूर को जल भंडार का संकेत देने वाले वृक्ष के रूप में। अब इनके साथ घास की तीन और झाड़ियों की दो प्रजातियों का नाम भी जुड़ने जा रहा है जिन्हें प्रकृति प्रदत्त अनमोल जल संकेतक की पहचान मिली हुई हैं प्रदेश के वनांचलों में।

खास है यह घास

कांस घास। यह नदी तट पर मिलती है। नीचे भरपूर जल भंडार के होने का संकेत है इसका होना। खस घास इसलिए खास है क्योंकि यह जल संरक्षण की अद्भुत क्षमता रखता है। खस घास की विशेषता यह होती है कि इसके होने से नमी की मानक मात्रा बनी रहती है। इससे जल संरक्षण और जल भंडार की स्थिति सामान्य बनी रहती है।

जल संकेतक यह झाड़ियां

अब तक के अनुसंधान में सबसे अनोखा नरकट नामक वह झाड़ी है, जिसे स्थाई जल भंडार वाली झाड़ी के रूप में मान्यता मिल चुकी है। हर मौसम में इसका यह गुण बना रहता है। मोथा या नागर मोथा के नाम से पहचानी जाने वाली यह झाड़ी उथले जल भंडार का संकेत देती है। जिससे ग्रीष्मकाल के शुरुआती दिनों में होने वाले जल संकट से निजात पाया जाता है।

जल की स्थिति बताने वाले जलीय पौधे

कमल का होना स्थिर और स्वच्छ जल की उपस्थिति का परिचायक माना गया है जबकि कुमुदिनी की मौजूदगी यह दर्शाती है कि सेवन के योग्य नहीं है पानी। जल घास मदद करता है तालाब का जल स्तर बनाए रखने में जबकि सिंघाड़ा की उपस्थिति शांत जल क्षेत्र को सामने लाती है। चारों तरफ से कोपभाजन का शिकार बनी जलकुंभी का पानी अत्यधिक प्रदूषित और उच्च पोषक तत्वों से युक्त माना गया है।

जल संकट से निपटने का प्राकृतिक समाधान

पीपल, अर्जुन, जामुन, कुम्ही, कांस घास, खस, नरकट और मोथा जैसी प्रजातियाँ प्राकृतिक जल संकेतक हैं, जो भूमिगत जल भंडार की उपस्थिति और स्थायित्व का स्पष्ट संकेत देती हैं। इन पौधों का संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन जल स्रोतों की पहचान, संरक्षण और पुनर्जीवन में सहायक हो सकता है। पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वानिकी को जोड़कर जल संकट से निपटने के साथ-साथ सतत विकास और आजीविका के नए अवसर भी सृजित किए जा सकते हैं।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर