दोगुनी हो जाएगी पेंसिल
बिलासपुर। धमक चाइनीज़ स्लेट की। इसलिए ठहरी हुई है कीमत लोकल स्लेट पट्टियों की लेकिन पांच रुपए पैकेट में मिल रही पेंसिल दोगुनी से आगे जा सकती है क्योंकि चौतरफा मांग के दबाव में हैं पेंसिल बनाने वाली ईकाइयां।
नए शैक्षणिक सत्र के लिए तैयार हो चुकीं हैं शैक्षणिक सामग्री विक्रेता संस्थानें लेकिन इस बार यह संस्थानें इसलिए चिंता में हैं क्योंकि परंपरागत स्लेट पट्टी के बाजार में पहली बार चाइनीज़ स्लेट ने अपनी न केवल पहुंच बना ली है बल्कि बच्चों और पालकों में पसंद भी की जा रही है।कीमत भी क्रय शक्ति के भीतर ही है।

सांसत में स्लेट पट्टी
स्लेट, स्टोन की 20,40,60 और 80 रुपए प्रति नग पर स्थिर है। 20,30,40,60 और 80 रुपए नग पर मिल रहीं हैं प्लास्टिक की पट्टियां लेकिन पहली बार पीढ़ियों से चली आ रही इन पट्टियों को चायनीज स्लेट से कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है क्योंकि कई मायनों में नई सुविधाओं से लैस चाइनीज़ स्लेट खरीदी के लिए बच्चों और पालकों को लुभा रहीं हैं।
पेंसिल दे रहा तेजी का संकेत
मन्दसौर की लाइम स्टोन की खदानों से पेंसिल क्वालिटी का स्टोन पहुंचता है पेंसिल उत्पादक कारखानों में। फिलहाल 5 रुपए पैकेट पर शांत पेंसिल के पैकेट की कीमत दोगुनी जाने की धारणा इसलिए बन रही है क्योंकि मानसून प्रवेश के साथ इन खदानों में जल-जमाव बढ़ जाएगा।इस स्थिति में उत्पादन संभव नहीं होगा। इसके अलावा देश स्तर पर पेंसिल में मांग का दबाव है। इसलिए पेंसिल दोगुने से आगे जा सकता है।

कड़ा मुकाबला यहां
तकनीक के दौर में अब ब्लैकबोर्ड भी डिजिटल हो चले हैं। निजी क्षेत्रों की शिक्षण संस्थानों में ऐसे डिजीटल ब्लैकबोर्ड की पहुंच 20 से 30 हजार रुपए में होने लगी है लेकिन ऐसी शिक्षण संस्थानों की संख्या अभी भी ज्यादा है, जहां परंपरागत लकड़ी से बने ब्लैकबोर्ड की ही खरीदी की जा रही है।कीमत की बात करें तो लकड़ी से बने ब्लैकबोर्ड 600 से 800 रुपए पर स्थिर हैं। इसलिए भी रुझान में बने हुए हैं।
दबदबा लोकल का
बाजार और शैक्षणिक संस्थानों में प्रभुत्व को लेकर हो रहे मुकाबले में लोकल चाक, ब्रांडेड चाक से आगे निकलता नजर आता है। इसमें बड़ी वजह 20,40 और 50 रुपए पैकेट जैसी कम कीमत मानी जा रही है जबकि ब्रांडेड चाक की न्यूनतम कीमत 50 और अधिकतम कीमत 60 रुपए प्रति पैकेट है। गुणवत्ता के मामले में दोनों एक समान ही हैं। इसलिए ब्रांडेड की तुलना में लोकल चाक की खरीदी को संस्थानें प्राथमिकता दे रहीं हैं।