बिलासपुर। भला हो गुझिया और पेड़ा का जिसने मांग में बनाए रखा है खोवा को लेकिन सूखे मेवों के बाद अब खोवा को चुनौती मिल रही है सेंवई, साबूदाना, तिखुर और राजगीर से जो खोवा की मिठाइयों का मजबूत विकल्प बन रहीं हैं।

चला- चली की बेला में आ रहे खोवा को पहली बार गुझिया और पेड़ा का मजबूत सहारा मिलता नजर आ रहा है क्योंकि दोनों मिठाइयों की मांग न केवल बढ़ रही है बल्कि पूरे साल खरीदी भी जा रही है। इसके बावजूद खोवा में अंतरजिला मांग जिस अनुपात में घट रही है उसे भविष्य के लिए चिंताजनक माना जा रहा है।

मजबूत सहारा

छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजनों में प्रमुख है गुझिया। ग्रामीण क्षेत्रों में त्यौहार, पर्व और घरेलू आयोजनों में विशेष रूप से बनाया जाता है। अब यह स्वीट कार्नरों के साथ पैक्ड मिठाई बनाने वाली कंपनियों की नजर में आ चुका है। इसलिए लोकल खोवा में डिमांड निकलने लगी है। गुझिया के बाद पेड़ा भी अब पूरे साल मांग में रहने वाली मिठाई बन चुका है। इसलिए खोवा को दूसरा मजबूत सहारा मिल चुका है।

बढ़ रहा दबदबा इनका भी

साबूदाना, सेंवई और तीखुर सहज ही मिठाइयों के विकल्प बन रहे हैं। साथ वह राजगीर भी दे रहा है, जिसके लड्डू और पापड़ी में डिमांड बढ़त ले रही है। हैरत इसलिए क्योंकि अब यह सभी सामग्रियां पैकिंग में आने लगीं हैं। कीमत की बात करें, तो खरीदी क्षमता के भीतर ही है प्रति किलो कीमत। इसलिए खोवा की मांग घटाने वाली मेवा की मिठाइयों के लिए भी खतरे की घंटी मानी जा रही है इनकी मांग।

टूट की आशंका मेवों की मिठाइयों में

सूखे मेवों की कीमतें फिर से बढ़ने लगीं हैं। असर मेवों से बनने वाली मिठाइयों की कीमत पर भी पड़ेगा। इसलिए प्रति पैकेट भाव बढ़ने के प्रबल आसार बनने लगे हैं। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि दीपावली के लिए एडवांस आर्डर की शुरुआत बेहद धीमी है। इसके अलावा स्थानीय सामग्रियों से बनाए जाने वाली मिठाइयों को लेकर बढ़ता रुझान निश्चित रूप से मेवों से बनने वाली मिठाइयों पर भी असर डालेगा।