बलौदा बाजार-भाटापारा। धीमी हुई चाल। तेज चल रही सांस। तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने के बाद की स्थितियों में अब ऊष्मा प्रभाव के घेरे में आ चुके हैं पशुधन और वन्य जीव। असर पक्षियों में भी देखा जाने लगा है।

चिड़चिड़े, बेचैन और कभी-कभी आक्रामक। पशुओं के व्यवहार में आ रहा है यह बदलाव स्पष्ट कर रहा है कि तापमान सामान्य से बहुत ज्यादा है और इसमें निरंतरता आगे भी ऐसी ही बनी रही, तो मामूली उत्तेजना पर भी तीव्र प्रतिक्रिया दे सकते हैं पशुधन और वन्य जीव।

क्षमता से बाहर तापमान

क्षमता 40 डिग्री सेल्सियस तापमान सहने की लेकिन इस समय पर 44 से 45 डिग्री सेल्सियस पर पहुंचा हुआ है। तापमान का स्तर बीते चार दिनों से जैसा बना हुआ है और आगे भी ऐसे ही बना रहा तो चिड़चिड़ापन, बेचैनी और उग्रता और भी ज्यादा बढ़ने की आशंका है। यह स्थिति एकाएक आक्रामक होने के लिए पशुओं को आगे बढ़ा सकती है। इसे चिकित्सकीय भाषा में ऊष्मा तनाव कहा जाता है।

धीमी चाल, तेज सांस

उच्च तापमान के बाद पशुओं में ऊष्मा तनाव का प्रभाव व्यापक रूप से देखा जा रहा है। प्रभावित पशु न केवल जल्द थक जा रहे हैं बल्कि संतुलन के लिए तेज सांस ले रहे हैं। हांफते पशु अत्यधिक लार छोड़ रहे हैं। बेचैनी और चिड़चिड़ापन इतना अधिक है कि एकाएक उग्र होकर तीखी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इसके अलावा भोजन भी सामान्य दिनों की तुलना में लगभग 10 से 15 फ़ीसदी कम ले रहे हैं।

प्रभावित पालतू पशु दे रहे संकेत

अत्यधिक हांफना, गुर्राना, बेचैनी और काटने की बढ़ती प्रवृत्ति सबसे ज्यादा श्वानों में देखने में आ रही है। गाय- भैंस भोजन तो कम कर ही रहें हैं। इसके अलावा बार-बार पूंछ हिलाना और पैर पटकना जैसे असामान्य व्यवहार कर रहे हैं। ऐसी स्थितियों में पर्याप्त पेयजल, छायादार और ठंडा वातावरण देना होगा। छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश में यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि गर्मियों के दिनों में यहां का तापमान हमेशा से 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक ही रहता है। लिहाजा सावधानी बेहद अनिवार्य है।

छाया एवं पानी की व्यवस्था अनिवार्य

पशुओं के असामान्य व्यवहार पर नजर रखे हुए हैं लेकिन बच्चों पर इस तापमान का असर जरूर पड़ने की आशंका है। शुद्ध पेयजल और छायादार जगह पर ही पशुओं को रखने की सलाह मवेशी मालिकों को दी जा रही है।
-डाॅ एस एन अग्रवाल, अतिरिक्त उपसंचालक, पशु चिकित्सालय भाटापारा