वायु गुणवत्ता सूचकांक में प्रदूषक सूक्ष्म कण का स्तर पी एम-2.5 पर
बिलासपुर। हरित राज्य और स्वच्छ वायु का क्षेत्र छत्तीसगढ़ महत्वपूर्ण पर्यावरणीय मोड़ पर खड़ा है। राज्य के हर जिले अब अपनी खराब होती हवा की पहचान बन रहे हैं। विशेष तौर पर कोरबा, रायगढ़, भिलाई और रायपुर की स्थिति बेहद गंभीर मानी जा रही है।
विकास की पहचान है कोयला आधारित बिजली घर। लौह अयस्क आधारित इस्पात संयंत्र और चूना पत्थर आधारित सीमेंट कारखाने लेकिन इनके लिए हो रहा खनन और संयंत्रों का संचालन वायु में स्थूल कणों की मात्रा तेजी से बढ़ा रहा है। यह स्थिति वायु प्रदूषण को न केवल बढ़ा रही है बल्कि बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर गहरा प्रभाव डाल रही है।

नजर में यह जिले
ताप विद्युत संयंत्र एवं कोयला खनन वाला कोरबा तथा रायगढ़ जिला, इस्पात उद्योग वाला भिलाई और निर्माण के साथ व्यस्त यातायात वाला रायपुर जिला निम्न वायु गुणवत्ता के मामले में सबसे आगे है। जबकि मध्यम स्तर पर आ चुका है बिलासपुर, दुर्ग और जांजगीर- चांपा जिला। बेहतर माने जा रहे हैं बस्तर, कांकेर और नारायणपुर जिले लेकिन बलौदा बाजार- भाटापारा जिला तेजी से मध्यम रूप से प्रभावित जिले में आ रहा है क्योंकि इस जिले में भी सीमेंट और पावर प्लांट संचालित होने लगे हैं।
सावधानी बेहद जरूरी
वायु गुणवत्ता सूचकांक के मुताबिक प्रमुख प्रदूषक सूक्ष्म कण स्तर पी एम-2.5, लगभग 23 माइक्रोग्राम पर बना हुआ है। इसे सामान्य लोगों के लिए फिलहाल ठीक माना जा रहा है लेकिन बच्चों और बुजुर्गों के लिए संवेदनशील बताया जा रहा है। जबकि कोरबा जिले में यह खतरनाक स्थिति पर पहुंच चुकी है। दूसरे नंबर पर रायगढ़ जिला और तीसरे स्थान पर बिलासपुर आ चुका है। लिहाजा इन जिलों में सतर्कता बेहद जरूरी है स्वास्थ्य के मामले में क्योंकि इन जिलों में प्रदूषक तत्व अब स्थाई बन चुके हैं।

खराब की श्रेणी में नहीं लेकिन…
प्रदेश के सभी जिले खराब की श्रेणी में फिलहाल नहीं है लेकिन जोखिम क्षेत्र के बेहद करीब हैं। इनमें कोरबा, रायगढ़, रायपुर और भिलाई सबसे आगे हैं। संतोषजनक से मध्यम श्रेणी के जिलों में विशेष सतर्कता की जरूरत है क्योंकि औद्योगिकीकरण तेजी से हो रहा है इन जिलों का भी। यह इसलिए क्योंकि पीएम 2.5 जैसे प्रमुख कारक अब स्थाई बनते जा रहे हैं। प्रदेश में जिस गति से औद्योगिकीरण हो रहा है और नियंत्रण के उपाय को लेकर अनदेखी की जा रही है उससे हल्की से मध्यम बीमारी वाले के लक्षण नजर आने लगे हैं।
वायु गुणवत्ता सुधारनी होगी
वायु गुणवत्ता में गिरावट के स्पष्ट संकेत को देखते हुए कृषि वानिकी मॉडल अपनाना होगा। औद्योगिक एवं शहरी क्षेत्र में भी पीएम 2.5 अवशोषित करने वाले नीम, बरगद, पीपल, शीशम, कचनार, गुलमोहर, जारूल, करंज, पेल्टाफॉर्म, जामुन, अशोक और अर्जुन के पौधों का रोपण करना होगा। प्रदूषण निवारण करने वाले उपकरणों का नियमित चालन आवश्यक होगा। छत्तीसगढ़ की हवा पूरी तरह खराब नहीं हुई है लेकिन खतरे के संकेत स्पष्ट मिलने लगे हैं। इसलिए जरूरत है वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सख्त नीतियां और समाज की सक्रिय भागीदारी क्योंकि आज की यह समस्या कल राज्यव्यापी संकट बन सकती है।

गंभीर पर्यावरणीय संकट
छत्तीसगढ़ में वायु गुणवत्ता में गिरावट अब एक उभरता हुआ गंभीर पर्यावरणीय संकट बन चुका है, जिसे समय रहते नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है। औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सामंजस्य स्थापित करना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। बहु-स्तरीय हरित पट्टियाँ तथा स्थानीय प्रजातियों का वैज्ञानिक रोपण वायु प्रदूषण नियंत्रण के प्रभावी और टिकाऊ समाधान सिद्ध हो सकते हैं। यदि अभी ठोस और समन्वित कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या केवल पर्यावरणीय ही नहीं, बल्कि एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है।
अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ़ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर
