अब मवेशी बाजार कहां…!

नई तकनीक का दौर में बिसर रही परंपरागत खेती

भाटापारा। कुछ बरस और बीतने दीजिए, फिर किताबों में ही हल चलाता किसान नजर आएगा। तकनीक के इस दौर में हल-बैल तेजी से पीछे छूटते जा रहे हैं। यही वजह है कि अब मवेशी बाजार नहीं लगते। जहाँ लग रहे हैं, वहां इन्हें अंतिम दौर की ओर बढ़ता हुआ देखा जा रहा है।

बारिश के एक माह पहले से लगने वाले मवेशी बाजार की संख्या तेजी से घटती जा रही है। हाल कुछ ऐसा है कि अब गांवों में लगने वाले मवेशी बाजार भी नही लगते। जिले के बडे़ मवेशी बाजारों के लिए पहचान रखने वाला बिलाईगढ़ और बलौदाबाजार का मवेशी बाजार भी अंतिम सांस ले रहा है। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जिले दूसरे मवेशी बाजार का हाल कैसा होगा ?

इसलिए अंतिम दौर में

पशु क्रुरता अधिनियम का सख्ती से पालन, बड़ी वजह बन रही है, तो तकनीक का बढ़ता चलन भी प्रमुख कारण के रूप में देखा जा रहा है। नई पीढ़ी का खेती से घटता रुझान भी तीसरी वजह के रुप में देखा जा रहा है। चौथी वजह, खेतीहर मवेशी के पालन को लेकर घटती रुचि, भी बन रही है। इस सबके अलावा हरा चारा की पूरे साल उपलब्धता का ना होना और सूखा चारा में आई महंगाई भी प्रमुख कारकों में से एक हैं।

केवल यहां ही उपयोग

खेती-किसानी के काम में अब केवल बियासी में ही मवेशियों की मदद ली जा रही है। कल्टीवेशन, मताई, रोपाई जैसे काम ट्रेक्टर के हवाले हो चुके हैं, तो कटाई का काम भी हार्वेस्टर से होने लगा है। बाद के लिए जरूरी सभी काम भी कृषि यंत्रों के सहारे ही हो रहे हैं। ऐसे में खेतीहर मवेशियों के पालन का काम अब अनावश्यक माना जा चुका है।

अब यहां सन्नाटा

जिले में मुख्यतः बलौदाबाजार, बिलाईगढ़, पलारी, भाटापारा, दामाखेड़ा, कड़ार,सिंगारपुर और निपनिया ऐसे नाम हैं, जहां के मवेशी बाजार की पहचान बड़े शहरों तक में थी। मानसून के एक माह पहले से यहां दूर-दूर के क्रेता और विक्रेता आते थे। अब इन शहरों के मवेशी बाजार की जगह, दूसरे व्यवसाय हो रहे हैं। ऐसे में केवल यादों में ही रह गए हैं मवेशी बाजार। बारी है किताबों की, जिनके पन्नों में नजर आएंगे मवेशी बाजार और हल चलाता किसान।