मंजूर है 32 रुपए किलो…

मिलेट मिशन का असर, बाजरा ने दिखाया दम


बिलासपुर। 32 रुपए किलो। उच्च पोषक तत्वों से भरपूर बाजरा की यह कीमत चौंका रही है लेकिन मिलेट मिशन को मिल रही चहूं ओर लोकप्रियता के बीच यह कीमत मंजूर कर रहा है, बाजार और उपभोक्ता।

खान-पान की बदलती शैली के बीच 1950 के दशक में भारतीय थाली से गायब हो चुका बाजरा फिर से रसोई घर में पहुंचने लगा है। मोटे अनाज में इसे भी लिया जाता था। बदलते समय और पोषक तत्वों के खुलासे के बाद नए कलेवर और नए रूप में पहुंचने की कोशिश रंग लाती नजर आ रही है। यही वजह है कि फसल का रकबा बढ़ रहा है, उत्पादन भी बढ़ रहा है और बढ़ रही है उपभोक्ता मांग।

क्यों गायब हुआ बाजरा

भारतीय उपभोक्ताओं के बीच खान-पान की शैली में पश्चिमी स्वाद का प्रवेश हुआ। 1950 के दशक में शुरू हुआ यह बदलाव चावल और गेहूं के लिए पर्याप्त जगह छोड़ गया। जबकि हरित क्रांति के दौर के पहले तक उत्पादन क्षेत्र में बाजरा की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत तक थी।

यह वजह भी

पर्यावरणीय परिणाम और उपभोक्ता मांग के बीच जिस तरह से उपेक्षित किया गया, उसके बाद इसकी फसल और उत्पादन महज 10 फ़ीसदी रह गया। इसकी जगह गेहूं और चावल जैसे अनाजों ने ले ली। अब एक बार फिर से जैसे प्रयास हो रहे हैं उसके बाद बाजरा की खेती को लेकर भारतीय किसान रुझान दिखा रहा है।

हैं कई प्रजातियां

भारत में अनाज के विकास के निशान का प्रारंभिक इतिहास में तीन प्रकार के बाजरा को मुख्य माना गया है लेकिन बाद के दिनों में ज्वार, रागी कोदो और प्रोसो को भी बाजरा की प्रजातियों में मान लिया गया। अब यह सभी प्रजातियां अपना मुकाम खुद बना रहीं हैं।

यह राज्य ले रहे फसल

एसोचैम की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक देश में राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, उत्तराखंड, झारखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा में इसकी व्यावसायिक फसल ली जा रही है। धान, गेहूं, मक्का के बाद बाजरा चौथे क्रम पर है। जिसकी खेती का रकबा 7.05 मिलियन हेक्टेयर है।

खाद्य व पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण

बाजरा, भारत में उत्पादन की जाने वाली प्राचीन फसलों में से एक है। आंकड़ों के मुताबिक वर्तमान में 130 से अधिक देशों में बाजरा का उत्पादन किया जाता है। बाजरा भारत में बड़े पैमाने पर खरीफ की फसल है और यह आजीविका तथा किसानों की आय बढ़ाने व विश्व में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में बेहद महत्वपूर्ण फसल है।
– डॉ अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट, फॉरेस्ट्री, टीसीबी कॉलेज ऑफ एग्री एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर